सोमवार, ८ फरवरी २०१०

ज्यूँ घटाएं रातभर जलजल हुई मल्हार से

रात भर आवाज देता है कोई उस पार से
साथ दे अब और भी चाहा नहीं संसार से

देख के उनको नजर भर प्यार का दरिया बहा
ज्यूँ घटाएं रातभर जलजल हुई मल्हार से

आज आजादी कहाँ है ये कहाँ की बंदगी
आँख के आगे जफा तो जी रहे लाचार से

आज जाने दे मुझे क्यूँ रोकता तकरार पे
प्रेम के दो बोल काफी क्या मिलेगा खार से

जीत के सारा जहाँ वो रो पड़ा था बाखुदा
हाथ खाली था सिकंदर जब गया संसार से

जाम थामे हाथ में साकी
पिलाता बारहा
राज पाखी तू बता चढ़ता नशा क्यूँ हार से

प्रकाश पाखी

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सोमवार, १ फरवरी २०१०

आधुनिक भक्ति वेदान्त का शेयर कर्म योग



अर्जुन उवाच-

हे जनार्दन,हे,केशव!जब आप घर बर्बाद करवाने और दिवालिया हो जाने के साधनों में अन्य कई प्रकार के साधनों को भी श्रेष्ठ मानते है,तो फिर मुझे शेयर बाजार में पैसा लगाने के घोर कर्म में क्यों लगाना चाहते है.आपके अनेकार्थक मिले जुले उपदेशों से मेरी बुद्धि मोहित हो गई है.अत:आप मुझे निश्चय पूर्वक मुझे बताएं कि इनमे से मेरे लिए सर्वाधिक बर्बादीप्रद क्या होगा.ताकि में शीघ्रातिशीघ्र रोड पर आसकूं.
श्री भगवानुवाच-

हे निष्पाप अर्जुन!मैं पहले ही बता चुका हूँ कि आत्म बर्बादी का प्रयत्न करने वाले दो प्रकार के पुरुष होते है.कुछ लोग जुआ सट्टा योग से इसे समझने का प्रयत्न करते है तो कुछ शेयरबाजार के द्वारा.न तो कोई जुए से विमुख होकर एक पल भी रह सकता है न ही सट्टे के बिना.प्रत्येक व्यक्ति को अपनी प्रकृति से अर्जित गुणों के अनुसार जिन्दगी भर जुआ खेलना पड़ता है और हारना पड़ता है.कोई व्यक्ति वोट के रूप में नेता पर जुआ खेल कर बर्बाद होते है.तो कोई अपने बच्चों पर दांव लगा कर बर्बाद होता है.सरकारी अफसर चुनावों में नेताओं पर दांव लगाते है.ट्रांसफर और पोस्टिंग पर जुआ खेला जाता है.लाटरी और क्रिकेट का सट्टा तो तुम जानते ही हो.इन सट्टो पर न केवल बर्बादी बल्कि उसके साथ पुलिस का फट्टा पड़ने का भी भय होता है.परन्तु हे निद्रा जयी अर्जुन!शेयर बाजार ऐसा सट्टा है जिसमे पुलिस का फट्टा नहीं पड़ता है।

जो व्यक्ति यह कहकर कि मैं सट्टा नहीं खेलता परन्तु मजबूरी में जुए का शिकार होता है वह मिथ्याचारी कहलाता है।

एक किसान खेती का जुआ हर साल खेलता है.एक वोटर प्रगति और विकास का जुआ खेलते हुए जिन्दगी भर नेताओं को वोट देता रहता है.एक फरियादी न्याय का जुआ खेलता है और सालों तक हारता है.एक आदिवासी पर्यावरण पर पैसा खाने वाले एन जी ओ के शिकार होकर जुआ खेलते है.मीडिया खबर बनाने का जुआ खेलता है. जीवन में हर वक्त हर व्यक्ति के लिए कोई न कोई जुआ सामने होता है...वह चाहे उसे खेले या नहीं उसका हारना तय है.इसलिए तू जुआ खुल कर खेल और शेयर में पैसा लगा।

जब से हमारे देश में नेताओं के लिए लोक तंत्र आया है तब से बड़ी बड़ी कम्पनियों की पौ बारह हो रही है...तू बड़े बड़े उद्योग पतियों के कल्याण में ही अपना कल्याण समझ.शेयर बाजार एक ऐसा जरिया है जहाँ तू और तेरे जैसे लाखों लोग तत्काल अपनी पूँजी गँवा सकते है.तू जुआ खेल तभी ही तू बर्बाद हो पायेगा.एक बार बर्बाद होने के बाद तुझे संसार मोह माया से विरक्ति होगी.जिससे तेरा कल्याण होना शुरू हो जाएगा।

तेरे शेयर कर्म से ब्रोकर और बिजनेस चेनल प्रसन्न होंगे,जिससे कम्पनिया बिना कुछ किये लोगों के पैसे कानूनी तौर पर हडप सकेंगी.इससे देश के कुछ और उद्योगपति फ़ोर्ब्स की सूची में आ जाएंगे..और देश के करोड़ों लोग गरीबों की रेखा रुपी सूची में आ जायेंगे.बिजनेसमेन प्रसन्न होने तो वे नेताओं को प्रसन्न करेंगे और नेताओं के प्रसन्न होने से ही हमारे देश में सच्चा लोक तंत्र आएगा।

जो व्यक्ति देश के नेताओं और उद्योगपतियों को खुश रहने में बाधा उत्पन्न करता है उस पर देवता कभी प्रसन्न नहीं होते है.वह निश्चित ही अनाधिकार भोगने वाला चोर है।

किन्तु हे प्रिय अर्जुन!जो व्यक्ति श्रद्धा पूर्वक शेयर बाजार में अपनी समस्त पूँजी लगाता है.वह आत्म बर्बादी के चरम साक्षात्कार को प्राप्त होता है.और उसकी समस्त पूँजी ठीक वैसे ही ब्रोकरों और और फर्जी कम्पनियों द्वारा खींच ली जाती है जैसे वेक्यूम क्लीनर धर के कचरे को खींचता है.उसके बाद उसके पास इस संसार में करने योग्य कुछ भी शेष नहीं रह जाता है.इसलिए तू अनासक्त भाव से शेयर बाजार में पूँजी लगा।

तू निश्चित ही बर्बाद हो सकेगा.ऐसा मेरा विश्वास है।

(इस प्रकार आधुनिक भक्ति वेदान्त का शेयर कर्म योग नामक अध्याय पूर्ण हुआ )

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सोमवार, १८ जनवरी २०१०

सफीनों ने साहिल से क्या कह दिया समंदर डरा बेजुबाँ हो गया

1
मेरा चांद मुझमें निहाँ हो गया
कि नीचा बहुत आसमाँ हो गया

न इकरार ही कर सके ना मना
नजर से इश्क खुद बयाँ हो गया

गुलों तितलियों से कभी खुश हुआ
बटुक वो सखी बागबाँ हो गया

जो पूछा कि हमसे मुहब्बत है क्या
निगाहें झुकी सब बयाँ हो गया

2
वो जब से मेरा सायबाँ हो गया
मैं सब गलतियों की दुकाँ हो गया

मुझे दुश्मनों से गिला है नहीं
जो अपना बना,बे इमाँ हो गया

मिले इश्क में जख्म इस कदर
सिले होठ मैं बेजुबाँ हो गया

गिला गैर की चोट का क्या करूं
दगाबाज जब राजदां हो गया

लिए फूल पत्थर के ताजिर मिले
चमन आज फिर बदगुमाँ हो गया

सफीनों ने साहिल से क्या कह दिया
समंदर डरा बेजुबाँ हो गया

(सफीना -- कश्ती)

प्रकाश पाखी
(बटुक-बालक,ताजिर-व्यापारी,बदगुमाँ-आशंकित,निहाँ होना -समाजाना,छुप जाना,)

गौतम भाई और वीनस भाई के सुझावों से गजल की कुछ मूलभूत कमियाँ दूर कर इसे पुन:प्रस्तुत कर रहा हूँ.

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शनिवार, ९ जनवरी २०१०

राजस्थान पत्रिका द्वारा सड़क सुरक्षा पर आयोजित सेमीनार

इक्कीसवां राष्ट्रीय सडक सुरक्षा सप्ताह देश भर में आम लोगो में वाहन चालन और सुरक्षा नियमों के प्रति परवाह और जागरूकता उत्पन्न करने के लिए मनाया गया.हमारे भीलवाडा जिले में यह जिस उत्साह से मनाया गया वह सुखद था.इसकी ख़ास बात यह रही कि मीडिया ने आम लोगों में यातायात के नियमों और ट्रेफिक सेन्स के प्रति 'अवेअरनेस' को लेकर एक आन्दोलन सा छेड़ दिया है.और जनता ने भी इसका सकारात्मक जवाब दिया.
प्रसिद्द दैनिक समाचार पत्र राजस्थान पत्रिका ने इस अवसर पर एक परिचर्चा आयोजित की जिसमे जिले के पुलिस प्रमुख और एस पी श्री पी. रामजी,डी वाई एस पी(शहर) और मेरे बेच मेट श्री उमेश ओझा, राजस्थान पत्रिका के संपादक श्री राजेश कसेरा,मेवाड़ चेंबर आफ कोमर्स एंड इंडस्ट्री के चेयरमेन एस पी नाथानी,व्यापार मंडल के अध्यक्ष श्री आर पोखरना,गुड्स ट्रांसपोर्ट एशोसिएशन के अध्यक्ष वी बी एस राठोड,प्रबुद्ध वकील श्री एम् जी पुरोहित सहित भीलवाड़ा के अपने क्षेत्र के प्रमुख व्यक्तियों ने हिस्सा लिया.चर्चा इतनी सार्थक,उपयोगी और प्रेरणादायक रही कि राजस्थान पत्रिका ने इस पर अपना एक पेज निकाला है.(उसको अगली पोस्ट में पेश करूंगा).फिलहाल प्रस्तुत है इस सेमीनार की झलकियाँ.



मेवाड़ चेम्बर आफ कामर्स के अध्यक्ष और व्यापार मंडल के अध्यक्ष सहित गणमान्य प्रतिभागी
महाविद्यालय के प्राचार्य
डिप्टी एस पी (शहर)उमेश ओझा
जरा पहचाने ये कौन है?
परिचर्चा के प्रतिभागी प्रबुद्ध नागरिक
राजस्थान पत्रिका के संपादक श्री राजेश कसेरा
राजस्थान पत्रिका और परिवहन विभाग द्वारा आयोजित सड़क सुरक्षा के विषय पर पोस्टर प्रतियोगिता के विजेता के पोस्टर्स
इस सप्ताह हम संकल्प लें कि हम देश में प्रतिवर्ष सडक दुर्घटनाओं में होने वाली एक लाख से अधिक मौतों,पांच लाख से अधिक होने वाले घायलों और ११००० करोड़ की राष्ट्रीय सम्पदा के नुक्सान को कुछ कम करने का प्रयास करेंगे.
कामना करता हूँ कि नव वर्ष आपके आपके परिवार के लिए और आपके समस्त मित्रों और परिचितों के लिए और जिनको आप जानते है सबके लिए सुखमय हो और दुर्घटना मुक्त हों.
आपका
प्रकाश

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गुरुवार, ३१ दिसम्बर २००९

पुल टूटे तो परवा किसको डाली है रेती थोडा माल


जब तू बीता पिछला साल
दुबले रह गए अपने हाल

जनता ढूंढें मिले न दाल
मोटो को फिर मोटा माल

इंसाफी में फिर फिर देरी
काले कोट को रंग गुलाल

दूर देश के बैंक भले हैं
काला पैसा उसमे डाल

सारे गुंडे शागिर्दों ने
निर्वाचन में ठोकी ताल

चुनना तो इक मजबूरी है
पांच बरस अब नींद निकाल

पुल टूटे तो परवा किसको
डाली है रेती थोडा माल

प्रकाश पाखी


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बुधवार, ९ दिसम्बर २००९

आज मैं ऊपर,आसमां नीचे..




रात के डिनर में पी के सर के यहाँ फिश फ्राई और सैलाना रेसिपी का कालिया तर खाकर आनंदित हो गए.बहुत दिनों बाद दिमाग काम के बोझ से मुक्त था.मेरे लम्बे पूजा पाठ की वजह से इस बात की आशंका जताई गई कि मैं सुबह फ्लाईट मिस करवा सकता हूँ.पर मैंने सुबह चार बजे उठकर नहा धोकर अपनी पूजा छ बजे तक पूरी कर दी.एअरपोर्ट जाने का काम मुझे कम ही पड़ता है.कुल मिलाकर यह मेरी जीवन की चौथी हवाई यात्रा होने वाली थी.जब हम एअरपोर्ट को रवाना हुए तो मैं टिकट पर लिखे इन्सट्रकशन पढ़कर चौंक गया.जयपुर में डोमेस्टिक फ्लाइट्स टर्मिनल २ से जाने वाली थी.पर मेरे कहने पर किसी ने गौर नहीं किया.हम टर्मिनल वन पर पहुँच गए.मैं अपने व्यवहार को मन ही मन बदलने और हवाई यात्रा को नार्मल लेने का प्रयास कर रहा था.बड़ी सहजता दिखाते हुए मैंने अपने आप को ऐसा दर्शाने की कोशिश की जैसे मै हर रोज हवाई जहाज से अप डाउन करता हूँ. मैंने एक ट्राली ली उस पर हमारा सामान रखा और हम सब अपने कार्ड दिखाते गेट में दाखिल हो गए.टिकट चेक कराते ही हमें सिक्युरिटी ने बताया कि आप गलत जगह आगये है.आपकी फ्लाईट टर्मिनल 2 से जाने वाली है जो यहाँ से तीन चार किलोमीटर दूर है.अब हमारी हालत देखने लायक थी.हमारी कार वापस मुड चुकी थी.मैं ट्राली और हवाई यात्रा के आदी होने की अपने चेहरे पर आई कृत्रिमता को एक तरफ डाल अपना सामान को दोनों हाथों से पकड़ कर वैसे भागा जैसे छूटती बस को पकड़ने के लिए अक्सर भागा करता हूँ.भला हो ड्राइवर का जिसने कार के रिअर व्यू मिरर में मुझे भागते देख लिया.खैर जल्दी उठने और जल्दी एअरपोर्ट पर पहुँचने के लाभ तो अब गायब हो चुके थे.हम डोमेस्टिक टर्मिनल पर पहुंचे तो चेक इन करने के लिए बहुत कम समय बचा था.भागते भागते चेक इन कर बोर्डिंग पास लिए.थोड़ी देर में हम हवाई जहाज में सवार हो गए.
हवाई जहाज और डीलक्स बस में ज्यादा फर्क मुझे नजर नहीं आया.बस में टू बाई टू सिटिंग होती है.तो हवाई जहाज में थ्री बाई थ्री सिटिंग होती है.सीटें हवाई जहाज में ज्यादा होती है.बस प्लेन आसमान में उड़ता है.और प्लेन में परिचारिकाएँ होती है उसकी जगह बस में खलासी होता है.मैं कल्पना करने लगा अगर एयर होस्टेस की तरह बस होस्टेस होती तो बस का सफर कितना सुखद होता और उसके विपरीत प्लेन में तीन चार खलासी होते तो शायद प्लेन में कोई बैठना पसंद नहीं करता.मिस्टर थरूर की केटल क्लास में बैठने के आनंद से भावातिरेक हो गया था.हवाई जहाज रन वे पर दौड़ लगा रहा था तो प्लेन क्रेश के तथ्य दिमाग में धुमड़ने लगे कि सबसे ज्यादा प्लेन क्रेश लेंडिंग और टेक आफ के समय होते है.तो बजरंग बाण, हनुमान चालीसा,राहू कवच और महा मृत्युंजय सहित ना ना प्रकार स्त्रोत मन ही मन पढ़ डाले.और प्लेन आसमान की ऊंचाइयां नापने लगा.
साढ़े बारह बजे प्लेन ने गुवाहाटी के लोकप्रिय गोपीनाथ बारदोलोई एअरपोर्ट पर लेंड किया.हम पूर्वोत्तर भारत के एक मनोरम और खूबसूरत प्रदेश में पहुंचे थे.और मैं अपने जीवन में पहली बार यहाँ आया था.

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शुक्रवार, ४ दिसम्बर २००९

दौड़ धूप के बीच बना एक प्रोग्राम



हफ्ते के पहले दो दिन व्यस्तता के चरम में बीते.आठ तारीख को मुख्यालय मीटिंग में हुक्म मिला की हर हाल में कम्प्यूट्राईजेशन बुधवार तक शुरू होजाना चाहिए.हालांकि हम इस तकनीक में अल्पज्ञानी ही है पर विभाग तो अभी मध्यकाल से निकल कर आधुनिक काल में प्रवेश कर रहा है तो हम अन्धो में काने राजा की तरह है और हमारे बिग बॉस ने पूरा यकीन दिलाया कि उन्हें मुझसे भारी उम्मीदें है.वैसे तो ऑफिस का काम विभाग के उद्भव के समय से लगभग एक सौ बीस गुना बढ़ गया है और हमारे कार्यालय में कुलजमा पांच बाबूजी कम्पूटर ऑपरेटरों के भरोसे गाडी गुडा रहे थे.पर नए सिस्टम में सारा काम बाबूजी को अपने हाथों से करना था.अलग यूजर नेम और पासवर्ड कि प्रणाली मानो बैंको से निकल कर हमारे कार्यालय में प्रवेश कर रही थी.मैंने भी हमारे फौजी अधिकारी भाइयों से प्रेरणा लेते हुए हमारे सबसे कमजोर बाबूजी को सबसे अधिक काम सौंप दिया और उसका साथ देते हुए उसके साथ अपनी कुर्सी लगा ली(अन्यथा वे अपना यूजर नेम और पास वर्ड ओपरेटर को दे सकते थे)...कम्पूटर के सामने बैठते ही बाबूजी ने ऐसी शक्ल बनाई कि जैसे वे बुक्का फाड़ कर रोना चाहते हों. खैर,आधुनिकीकरण कि शुरुआत हो गई.

तभी पी के सर का फोन आया.वे काफी समय से गुवाहाटी चलने का आग्रह कर रहे थे.इस बार भी मैंने वही जवाब दिया जो ऑफिस के कार्यो में व्यस्त होते समय अक्सर देता हूँ--हाँ,सर!बिलकुल..जब आप कहेंगे चल पड़ेंगे.और फोन रखते ही सब भूल गया.शायद यह सोच कर कि हो सकता है उनका ही प्रोग्राम केंसिल हो जाए.फिर अपना ध्यान ऑफिस में नए सिस्टम लागू कराने में लगा लिया.रात को साढ़े ग्यारह बजे कुल मिलाकर सेंतीस रजिस्ट्रेशन हुए.घर पंहुचा तो ठन्डे खाने के साथ श्रीमती की डांट खाने को मिली.मिड नाईट चिल्ड्रन को पढ़ते आँख लग गई.सुबह जल्दी उठकर ट्रेफिक सर्वे किया.और प्रशासन के अधिकारियों से डिस्कस कर के दस बजे ऑफिस पहुँच कर बाबूजी के पास कुर्सी लगा ली.

दिन भर की स्थिति यह थी की सौ के करीब लोग अपने काम के लिए आफिस में इकट्ठे हो चुके थे ...मैंने पूरे धैर्य से उनको झेला...बाबूजी के पास बैठने से आज का काम आज हो गया था..शाम को चार बजते शहर का मीडिया मेरे ऑफिस में आ धमका ..पर शुक्र था की सब ठीक रहा..चार बजे के बाद कल की ट्रेफिक मेनेजमेंट कमिटी की बैठक का एजेंडा तैयार किया...सब कुछ करते रात के आठ बज गए.एजेंडा की फोटो कोपियाँ करने से पहले लाईट चली गयी...तो शहर के उस हिस्से में जहाँ लाईट थी किसी को भेजा गया...कल पर कुछ भी नहीं छोड़ा जा सकता था.नई कलेक्टर मेडम की अध्यक्षता में पहली मीटिंग थी ,सो मैं पूरी तैयारी कर जाना चाहता था.नौ बजे तक सब काम निपटते देख कर मुझे तसल्ली हो रही थी.अचानक हमारे विभाग के प्रदेश के सबसे बड़े अधिकारी का फोन आगया.रात को मुझे स्वयम को मौके पर रहते हुए जिले में ओवर लोड वाहनों की चेकिंग कार्यवाही करानी थी.फिर जब मैंने अपनी चार आदमी की सेना को फ़ौरन हाजिर होने का हुक्म दे डाला...रात को साढ़े दस बजे तक तीन ने बीमारी,थकान और ड्राइवर न होने का कारण बताए हुए आने में असमर्थता दर्शाई...चौथे महाशय बिना गार्ड,चालक और गाडी के सामने आकर सेलूट कर खड़े हो गए.अब मुझे गुस्सा आगया...अपने उच्चाधिकारियों को स्थिति बता कर अकेला जंग के लिए रवाना हो गया.जब तक मैं दो घंटे में सात आठ गाड़ियाँ जप्त करता....तब तक ऊपर से कार्यवाही होने की सूचना पाते सारी फ़ौज अपने ठिकाने पर पहुँच गयी.सुबह चार बजते बजते कुलमिलाकर ४५ ट्रक थानों में पहुँच चुके थे.और मैं इस बात से बेखबर निढाल होकर बिस्तर में गिर चुका था कि पिछले २४ घंटे चाय और फास्ट फ़ूड पर गुजारे थे.सुबह नौ बजे उठकर फटा फट तैयार होकर,कलेक्ट्रेट पहुँच गया.होने वाली मीटिंग की कुछ पूर्व तैयारी जो करनी थी.

मीटिंग की आवश्यक व्यवस्थाएं देखी जा रही थी तो पी के सर का फिर फोन आ गया--मैंने गुवाहाटी की टिकट्स बुक करा दी है.तेरह को सुबह साढ़े आठ बजे फ्लाईट है.

और मैं चौंक गया.मैंने तो अभी अपने अफसरों से छुट्टी भी नहीं ली है.आनन फानन में सबको सूचना दी..और उसके बाद मीटिंग में व्यस्त हो गया.दोपहर को जयपुर के लिए कार से रवाना हो गया.पहले कुलदीप से बात की जो मेरे मित्र और इस सफ़र पर मेरे साथ चलने वाले थे.उनको साथ लेते हुए हम जयपुर के लिए रवाना हो गए. ड्राइवर कार को शहर से बाहर तक ले आया तबतक दिमाग से पिछले चार दिनों की भागदौड़ की थकान और तनाव विसर्जित होता नजर आया.मैं काफी हल्का महसूस कर रहा था और उसी समय कार की सीट पर नींद ने मुझे अपनी आगोश में ले लिया.जब आँख खुली तो मेरी कार जयपुर की गलियों को नाप रही थी.

कार रुकी तो पी के सर अपने विशाल बंगले के गेट पर बाहें फैलाए हमारा इन्तजार कार रहे थे.

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