गुरुवार, 15 अक्तूबर 2009

शब्द जो कविता न बन सके

उनका सोने का दिल है और भावों में समन्दर बसता है.
ये चट्टानी सीने वाले है पर बहुत मासूम अनेक बातों में.
वो पिघले फौलादो से हिला देते है मगरूर चोटियों को,
उनकी वर्दी को कर सलाम पाखी, वतन महफूज है नेक हाथों में.

(बहुत पहले गौतम भाई की एक पोस्ट पर किया कमेंट्स जो मुझे आज प्रासंगिक लग रहा है.) २
2
चाँद कहीं उतर आये तो लगता है कि तुम हो
कोई कली खिल जाए तो लगता है कि तुम हो
हम ढेर सी बाते लिए मिल लिए किसी से पर
बात दिल ही में रह जाए तो लगता है कि तुम हो
(चार लाईने बस यूँही)
हम यादों में बसे हैं कबसे कहाँ दूर तुमसे
शिकवे शिकायत ज़माने केलिए छोडो
जब भी याद आये पलक बंद कर लो
मिलने के तकल्लुफ जमाने के लिए छोडो

( बबली जी के ब्लॉग पर कमेन्ट लिखते बनी तुकबंदी जो उनकी पोस्ट के शब्दों का प्रयोग करे हुए बनाई थी)
यह शुभदिन हो मुबारक आपको..
यादों के पलछिन मुबारक आपको...
सदा खिलखिलाएं, खिले फूलों की तरह
खुशबू औ सरगम मुबारक आपको...
(दीवाली की शुभकानाएं)
थोडा और लड़ ले अंधेरों से 'पाखी'
उसने कहा था सुबह जरूर होगी...
लम्बी दीवारों के पार कुछ खोये हुए से पल है
किसी का विश्वास निश्छल और किसी के छल है
७.
ख्वाब और खामोशी के शब्दों में कुछ राज है
गुजरे कल के फासलों के दरम्यां कुछ आज है
इक चिराग बन जले इस तरह
रौशनी दूर तलक बिखर गयी
हिस्से आई किसी के बस तपिश
राह किसी की इस तरह संवर गयी
मेरे मन के शैतानो तुम ही सबसे सच्चे हो
जो जी में आता कर डालो जब तक छोटे बच्चे हो
जब उम्र बड़ी हो जाएगी,खेल नए दिखलाएगी
बाते आभा चेहरे झूठे,कहने को बस अच्छे हो
१०
वीर नहीं डरते इन तलवारों से और बाणों से
माँ मिटटी का कर्ज चुकाते देखो अपने प्राणों से
(वीर रस से ओतप्रोत कविता शुरू से आगे नहीं बढ़ सकी)
११
आदमी की सूरत के नाग मेरे देश में,
लोग लुटते होती बरबाद रोज बस्तियां,
फैलती जाए जो दंगो की आग मेरे देश में.
नेता फन खोलते बोलते तोलते माल मेरे देश का
कूटने फूटने लूटने पर मची भागमभाग मेरे देश में.

(पहली पंक्ति अलबेला जी की पोस्ट का शीर्षक है पोस्ट पर कमेन्ट करते समय उपजी पंक्तियाँ)

कुछ बेहतरीन पोस्टो को पढ़ते समय कुछ पंक्तियाँ मन में आई थी.जो आज एक साथ देखी तो लगा की भावों में लिपटे कुछ शब्द थे जो कभी कविता न बन सके.इन्ही बिखरे भावों की खुशबू के साथ दीपावली की शुभकामनाएं प्रेषित कर रहा हूँ.तकनीक में हाथ तंग होने के कारण इन पोस्टो के लिंक नहीं दे पा रहा हूँ.

16 टिप्‍पणियां:

परमजीत बाली ने कहा…

बहुत बढिया!! ऐसा कभी कभी हो जाता है कि कुछ पढते हुए मन में इस तरह के भाव आ जाते हैं की वह काव्य क्र रूप में बदल जाते हैं।बहुत बढिया पोस्ट है।

दर्पण साह "दर्शन" ने कहा…

kuch chezein unprocessed hi acchi lagit hai...
Natural !!
Virgin...
...Isliye badhai in shabdon ke liye jo (accha hua) kavita na ban sake...

(Tropicana walon se paise nahi liye maine)


.I wish ki kuch shabdon ki mala hamari post se bhi prerit hoti.
:(

Par ab ab pachtawat kya hot hai , jub pakhi likh gaye post !!
:)
haha

Diwali, Dhanteras, Bhaiya dooj ki hardik shubhkamnaiyen

raj ने कहा…

चाँद कहीं उतर आये तो लगता है कि तुम हो
कोई कली खिल जाए तो लगता है कि तुम हो
हम ढेर सी बाते लिए मिल लिए किसी से पर
बात दिल ही में रह जाए तो लगता है कि तुम हो ..yuhi likhi pankatia khoobsurat ban padhi....subh jaroor hogi bhi aas jgati hai.......

वन्दना अवस्थी दुबे ने कहा…

बहुत सुन्दर. दीपावली की शुभकामनायें.

ओम आर्य ने कहा…

बढ़ा दो अपनी लौ
कि पकड़ लूँ उसे मैं अपनी लौ से,

इससे पहले कि फकफका कर
बुझ जाए ये रिश्ता
आओ मिल के फ़िर से मना लें दिवाली !
दीपावली की शुभकामना के साथ
ओम आर्य

M VERMA ने कहा…

बहुत बढिया. सुन्दर
दीपावली की बधाई

sanjay vyas ने कहा…

एक रचनाकार की रचनाप्रक्रिया का पता चलता है. कितने अनगढ़ सांचे होते है उसके पास!और ये सब कितने सुंदर है!

sandhyagupta ने कहा…

Dipawali ki dheron shubkamnayen.

raj ने कहा…

स्वर्ग न सही धरा को धरा तो बनाये..
दीप इतने जलाएं की अँधेरा कही न टिक पाए..
इस दिवाली इन परिन्दों के लिए पटाके न चलायें....

Babli ने कहा…

बहुत ख़ूबसूरत!आपको और आपके परिवार को दिवाली की हार्दिक शुभकामनायें!

Kishore Choudhary ने कहा…

प्रकाश जी, नब्बे के आगाज़ में मेरा कवि दोस्त इकराम अजमेरी मुझ में ही समाया हुआ सा था लगता था कि एक ही मतीरे के बीज हैं हम दोनों, तो दुनिया के सारे कवियों से अलग मेरा दोस्त आप ही की तरह अपनी आधी अधूरी कविताओं से बहुत प्यार करता था उसने अपनी कविताओं को दीवारों पर टांग कर रखा था. उसे उम्मीद थी कि एक दिन वे कविताएं मुकम्मल होगी. आपके लिए भी उम्मीद करता हूँ ये कविताएं जल्द ही बड़ी होंगी.

अल्पना वर्मा ने कहा…

बहुत बार ऐसा होता है जब किसी पोस्ट को पढ़ते हुए कुछ नया लिखा जाता है....आप ने अपने इन बिखरे हुए शब्दों को sameta ..ab पूरी कविता भी बना लिजीये..
दीवाली की शुभकामनाये .

गौतम राजरिशी ने कहा…

बाप रे ये तो पूरा खजाना है। ये नाइंसाफी है प्रकाश जी..सरासर। एक साथ इतना सारा कुछ इकट्ठा और सब के सब एक-से-बढ़क्र एक कि किसको चुने, किसको छोड़ें।

आपका स्नेह, प्यार सब सर-आँखों पर।

दूसरे मुक्तक को पढ़कर एक पुरानी ग़ज़ल याद हो आयी "आहट-सी कोई आये तो लगता है कि तुम हो"।


" थोडा और लड़ ले अंधेरों से 'पाखी' उसने कहा था सुबह जरूर होगी" कमाल के म्सिरे हैं। इसे गज़ल की शक्ल दीजिये जनाब!

ये अगला "गुजरे कल के फासलों के दरम्यां कुछ आज है" वाला मिस्रा भी खूब बुना है। इन्हें यूं ही बेतरतीब छोड़ देंगे तो हम जैसे उठा कर ले जायेंगे।

आठवां और नौवां भी खूब पसंद आया।

इन बिखरे धागों को उठाइये सर और बुनिये इनसे कुछ और आगे।

दीवाली अच्छी मनी होगी...!!!

चेतना के स्वर ने कहा…

ban jayenge hukum jaroor ban jayenge. achchha likha hai lage rahiye. chetna ke thode chawal bachche ki anjuri me bhi aa jaye aisa prayas aksar rahta hai. lage rahiye

चेतना के स्वर ने कहा…

sirji abhi posting kahan hai??

कंचन सिंह चौहान ने कहा…

देर से आ पई यहाँ... लग रहा है दीपावली की छुट्टियों मे मिस हो गया....!

आपने सुंदर सुंदर फूल इकट्ठा कर लिया हैं, अब इन्हे तरतीब से लगा कर एक गुलदस्ता बनाना रह गया है...! बताईयेगा तो हम गुरुकुल वाले भी लग लेंगे...!

भाव सुंदर हैं...!