सोमवार, 8 फ़रवरी 2010

ज्यूँ घटाएं रातभर जलजल हुई मल्हार से

रात भर आवाज देता है कोई उस पार से
साथ दे अब और भी चाहा नहीं संसार से

देख के उनको नजर भर प्यार का दरिया बहा
ज्यूँ घटाएं रातभर जलजल हुई मल्हार से

आज आजादी कहाँ है ये कहाँ की बंदगी
आँख के आगे जफा तो जी रहे लाचार से

आज जाने दे मुझे क्यूँ रोकता तकरार पे
प्रेम के दो बोल काफी क्या मिलेगा खार से

जीत के सारा जहाँ वो रो पड़ा था बाखुदा
हाथ खाली था सिकंदर जब गया संसार से

जाम थामे हाथ में साकी
पिलाता बारहा
राज पाखी तू बता चढ़ता नशा क्यूँ हार से

प्रकाश पाखी

13 टिप्‍पणियां:

निर्मला कपिला ने कहा…

जीत के सारा जहाँ वो रो पड़ा था बाखुदा
हाथ खाली था सिकंदर जब गया संसार स
बहुत खूब पाखी जी आपकी ये लाजवाब गज़ल दिल को छू गयी। बधाई स्वीकार कीजिये इस के लिए

महफूज़ अली ने कहा…

खूबसूरत शब्दों के साथ..... खूबसूरत रचना....

सुलभ § सतरंगी ने कहा…

शायद मैंने तरही में पढ़ा था. यहाँ पढ़कर मजा आया.
खासकर सिकंदर वाले शे'र...

वन्दना अवस्थी दुबे ने कहा…

जीत के सारा जहाँ वो रो पड़ा था बाखुदा
हाथ खाली था सिकंदर जब गया संसार से
बहुत खूब पाखी जी.

श्याम कोरी 'उदय' ने कहा…

जीत के सारा जहाँ वो रो पड़ा था बाखुदा
हाथ खाली था सिकंदर जब गया संसार से
.....bahut sundar,prabhaavashaalee abhivyakti !!!!!

dimple ने कहा…

जीत के सारा जहाँ वो रो पड़ा था बाखुदा
हाथ खाली था सिकंदर जब ..ye jante hue bhi hum samjh kha paate hai,koee jaldi se or koee der se hai jane wala.

sanjay vyas ने कहा…

मुझे भी सिकंदर वाले शेर से याद आया इसे तरही में पढ़ा था.
बढ़िया है भाई. शुक्रिया.आमद हुई इसी बहाने और यारों की मौज हो गयी.

KAVITA RAWAT ने कहा…

Bahut achhi rachna...
Badhia

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन ने कहा…

रात भर आवाज देता है कोई उस पार से
साथ दे अब और भी चाहा नहीं संसार से

बहुत खूब!

Babli ने कहा…

महाशिवरात्रि की हार्दिक शुभकामनायें!
बहुत बढ़िया लगा ! बहुत ही सुन्दर और भावपूर्ण रचना लिखा है आपने ! बधाई!

गौतम राजरिशी ने कहा…

ये ग़ज़ल तरही मुशायरे में लगी थी क्या प्रकाश जी?

कुछ बेहद ही अच्छे मिस्रे बुने हैं आपने। मतला कबरदस्त है।...और दूसरा शेर तो उफ़्फ़्फ़...खासकर "रात भर जल-जल हुई" वाली बात..क्या कहने!

'अदा' ने कहा…

देख के उनको नजर भर प्यार का दरिया बहा
ज्यूँ घटाएं रातभर जलजल हुई मल्हार से

आज आजादी कहाँ है ये कहाँ की बंदगी
आँख के आगे जफा तो जी रहे लाचार से

poori ghazal ka mijaaz bahut dilkash hai..
saare sher behad nafees..
ham to tareef ke liye shabdon se hi laachaar ho jaate hain jab bhi aisi koi rachna padhte hain...
aur aaj fir ek baar laachaar ho gaye hain...

psingh ने कहा…

बिलकुल दुरुस्त फ़रमाया अपने
आज जाने दे मुझे क्यूँ रोकता तकरार पे
प्रेम के दो बोल काफी क्या मिलेगा खार से
सुन्दर रचना श्रे मिसरे अच्छे है ..
आभार