मंगलवार, 21 अप्रैल 2009

रिश्ता

"मुन्नी,तेरा नारियल आया है...!"मेरी सखी शान्ति लगभग हांफती सी कह रही थी।
" क्या??"
"पगली,रामपुर गाँव के सबसे बड़े खानदान से रिश्ता आया है।"वह चहकते हुए कह रही थी. मेरे मन में गुदगुदी सी हो रही थी।
देखते देखते गाँव की सारी औरते घर पर आने लगी।घर पर चहल पहल चरम पर पहुँच गई थी.माँ मुन्ना को सगाई का नारियल लेन वाले पंडितो के लिए कच्ची रसोई का सामन बाँध कर दे रही थी.गाँव के सरकारी सभाभवन में कुटम्ब के बुजुर्ग एव समाज के प्रतिष्ठित लोग इकठ्ठा हुए.कई जवान लड़के सबको पानी चाय और बीडी सिगरेट परोस रहे थे. हर नई घटना उनके उत्साह और उत्सुकता की वजह होती थी.कुछ लड़के जिस समर्पण से मेहमानों और बुजुर्गो की सेवा कर रहे थे उसी के अधिकार भाव से मुफ्त की सिगरेटों का सुट्टा लगा रहे थे.
दोनों पंडित जी जाजम के बीच बिछाए गद्दे पर विराजमान हो कर आशीर्वाद दे रहे थे। हर आने वाला 'पाँव लागु महाराज' का भाव हीन वाक्यांश बोल कर अपना स्थान ग्रहण कर रहा था।चाय की केतली दर केतली भर कर सभाभवन पंहुचाई जा रही थी.
औरते और बुजुर्ग महिलाए मेरे सर पर हाथ फेर कर आशीर्वाद दे रही थी।सभी मेरे भाग्य की सराहना कर रही थी।
बापू खुश नजर आरहे थे, ,पर जिम्मेदारी का भाव आजाने के कारण चेहरे पर गंभीरता ओढे हुए थे।

थोडी देर में सुन्दर कढाई की हुई दो जनाना पोशाकें घर में लाई गई।चाची ने दरवाजे पर पानी के कलश से पोशाक लाने वाले लड़के के दोनों और धार गिरा कर 'बधाकर' उन्हें घर में प्रवेश दिया।सारी औरतो की उत्सुकता चरम पर थी।एक बाजोट पर पोशाको और उनके साथ लाए सोने के हार को खुली मखमल की डिब्बी में रखकर प्रर्दशित किया गया।औरते आपस में बाते करने लगी।
" सुन्दर"
"मंहगा होगा?"
"तीन तोले का तो होगा"
"थोथ है,दो तोले से ज्यादा का नहीं होगा"
"बहुत सुन्दर है"
"पोशाकें भी मंहगी दिखती है।"
"कम से कम तीन हजार की तो होगी।"
"रामपुर के नाम जैसी तो नहीं है।"
मुझे पता चला कि वे मेरे लिए थी।इतनी इज्जत पाकर मैं मन ही मन बहुत खुश हो उठी।अचानक रामपुर मुझे अपना लगने लगा। *********************************************************************************************************************************** टीका दस्तूर चैत्र माह कि चौदस को मेरा टीका रामपुर भरा जाना था।कई दिनों से तैयारी चल रही थी।जिन रिश्तेदारो को साथ में लेजाया जाना था,उन्हें इत्तला कि गई।सरला बुआ को ससुराल से बुलाया गया।निकट के रिश्तेदारो के अलावा उन दूर के रिश्तेदारो को भी बुलाया गया जिनके खानदान और रिश्तेदारी ऊंची गिनी जाती है।बापू ने ५१ पोशाकें शहर से लाकर बुआ को सौंपी-
"सरला,इसे तैयार कर दो।हाँ,महँगी वाली १५ है जिनके ऊपर नाम लिखवा देना।"
"जी,बड़े भैया।"
घर में दस दिनों से बड़ी रौनक थी।पोशाकें तैयार करने के लिए ओढ़नियों के चमकीली किनारी लगाईं जारही थी.दोपहर के बाद घर के काम निपटा कर कुटुंब की सब औरते घर के बड़े हाल में इकठ्ठा हो जाती थी.फिर बातों,फुसफुसाहटों और खिलखिलाहटों का दौर चालू हो जाता था.चमकीली किनारियाँ लगाने में शाम हो जाती थी और पता ही नहीं चलता था.पहली बार घर की सब औरतो का केंद्र बिंदु मैं थी.कुछ बरस पहले सरला बुआ भी इसी तरह सबकी आँखों का तारा बनी थी जब उनकी शादी होने वाली थी।

शाम बापू और चाचा ऊंची आवाजों में बोल रहे थे-
"मैं अपनी जमीन हरगिज नहीं बेचने दूंगा॥!"चाचा कह रहे थे।
"जमीन तुम्हारी कहाँ से हो गई॥?अभी माँ बाप दोनों बैठे है।"
"तो क्या हुआ?दादा ने पहले ही गोचर के पास वाला खेत मुझे दे दिया था।"
"सरला की शादी में मुझे दिया खेत बिकवाया था तब क्यों नहीं बोले थे।"
"हमारे खेत को हाथ भी लगाया तो मैं जल मरूंगी या फिर कुए में कूद जाउंगी."चाची जो कभी बापू के आगे धीमी आवाज़ में भी बात नहीं करती थी,अब मुंह फाड़ के चिल्ला पड़ी।

"ठीक है मत बेचना तुम्हारा खेत...मैं भी बँटवारा नहीं मानता.मैं अभी तो मेरा खेत बेच दूगा,पर कान खोल कर सुन लेना दादा के तीनो खेतो में आधा हिस्सा लूँगा.....बहन की शादी में मेरा खेत बिक रहा था तो सब लोग तमाशा देख रहे थे...अब हक़ जताना याद आया है।" बापू कह रहे थे।
दादाजी दोनों को समझा रहे थे।

अगले दिन गाँव के मुआज्जिज लोग हमारे घर के बाहर बने चबूतरे पर बैठे थे.सभी लोग हक़ और न्याय की पंचायती कर रहे थे.दादाजी चाचा को कुछ समझाना चाह रहे थे,पर चाचा बार बार इनकार में सर हिला रहे थे.बड़े ताउजी जो दादाजी के भतीजे लगते है,आखिर में बोले-
"भाई फैसला तो यही होगा.या तो छुटकू सरला की शादी का आधा खर्च दे,नहीं तो उसका खेत बेचना वाजिब है.फिर अभी तुम्हारे माँ बाप जिन्दा है तो जमीन उनकी है.और यही फैसला उन्होंने किया है...ठीक!"
चाचा अब कुछ बोल नहीं पा रहे थे.शायद बहुत लोगो के आगे स्वार्थ की नंगी बात करने का आत्म विश्वास शेष नहीं था।
चाची का बडबडाना पूरे दिन जारी रहा।

दादा के अंगूठे लगवा कर खेत को साढे तीन लाख में बेचा गया.दो दिनों में बापू पांच तोले का ब्रेसलेट,चार तोले का सिरपेच और दो तोले की चेन बनवा लाये। जैसे जैसे टीके का दिन नजदीक आ रहा था वैसे वैसे घर की चहल पहल और रौनक बढती जा रही थी. ५१ पोशाकों की सजावट का काम पूरा हो गया था.उनको करीने से समेट कर पालीथिन में पेक किया जा रहा था।
' बड़े सासू जी के लिए'
'सासूजी के लिए'
'काकी सासूसा के लिए'
'गजपुर वाले ननद बाई सा के लिए।'
'हिम्मतनगर वाले ननद बाई सा के लिए।'
'कोलपुरा वाले बुआ सासू जी के लिए'
'अमर गढ़ वाले बुआ सासू जी के लिए'
'दिवरानी सा के लिए'
छोटी रंगीन पर्चियों में ये नाम लिखकर पोशाकों में रखे गए।
टीका दस्तूर के सिरपेच,ब्रेसलेट और गहने पोशाकों के साथ नए बक्से में रखे गए।
रवानगी के एक रात पहले सारे मेहमान आगये.मामाजी और बम्बई वाले बड़े भैया देर रात को पंहुचे।
एक दिन पहले एक मिनी बस घर के ठीक आगे खड़ी हो गई. उस दिन शाम तक रामपुर पहुंचना था.अगले दिन टीका भरा जाना था. दादाजी नए कपड़ो और गुलाबी पगड़ी में थे. बापू,चाचा,मुन्ना सभी नए कपड़ो में थे.बड़े ताउजी की गाडी में दादाजी और मामाजी बैठे।

बस में सबसे पहले शुभ मंगल के प्रतीक के रूप में गुड की भेली चढाई गई.बाद में पताशे और ड्राई फ्रूट अन्दर रखे गए.सरला बुआ ने सामान की लिस्ट बना कर बापू को संभलाइ.दादी और माँ ने सामान अच्छी तरह से सम्हालने की हिदायते दी।
गाँव के नाइजी सभी जाने वालो के कुमकुम तिलक कर रहे थे.मांगनियार अपनी हारमोनियम और कमायचे पर 'बनडा' गा रहे थे.ढोलन जी घर के दरवाजे पर 'बधावा' गा रही थी.औरतो ने 'हरख' और 'सोने के सूरज' के मंगल गान गाए. पहले गाडियाँ और बाद में बस रवाना हुई।

रामपुर में बहुत अच्छा इंतजाम किया गया था था.सबसे अच्छी धर्मशाला में पंद्रह कमरे बुक करवाए गए थे.एसी कमरे में दादाजी, बड़े ताउजी और मामाजी को ठहराया गया था।
शाम सात बजे के बाद खुले शामियाने में महफ़िल की व्यवस्था की गई.सफ़ेद कपड़ो से ढँकी टेबल कुर्सियों पर सभी लोग जम गए.लंगे और मंगनियारों और कालबेलियों के कार्यक्रम शुरू हो गए. रामपुर वालों की रिश्तेदारी के बड़े बड़े लोग इस अवसर पर आये थे।

गजपुरा राव सा,हिम्मतनगर दरबार,अमरगढ़ राणाजी,कोलपुरा राजाजी,बनपुर,श्रीगढ़,गज्तना और न जाने कहाँ कहाँ के ठिकानेदार आये थे.ऐसा लग रहा था जैसे किंग जेम्स पंचम का दिल्ली दरबार सजा हो।
प्यालों में बेहतरीन शराब परोसी गई.सबने एक दूसरे पर निछरावलें और मनुहारें की. दस के नोट सर पर वार कर कमीनों को दिए गए.हर व्यक्ति इतिहास में जितना संभव हो सके पीछे जाना चाहता था.अंग्रेजो के जमाने के किस्से चुटीले अंदाज सुनाकर मानों ऊंचे खानदान के प्रमाण पत्र पेश किये जारहे थे.सब लोग अपने परेशानी भरे वर्तमान को भूलते हुए अतीत में पंहुच कर खुश थे।

चाचाजी ने ज्यादा शराब पीने की वजह से या शायद खेत बेचे जाने के रंज की वजह से महफ़िल में बखेडा खडा कर दिया.सामने बैठे व्यक्ति के ऊंचे खानदान का गुरुर और अपनी कुंठा से तिलमिलाकर वे फट पड़े और और चिल्ला चिल्ला कर अपना पक्ष रखने लगे.बम्बई वाले बड़े भैया ने उनको सम्हाला.वे उन्हें उनके कमरे में ले गए जहाँ उन्हें बिस्तर पर लेटाया गया और उन्होंने वहां रात भर उल्टियां की।

सुबह के वक्त टीके का दस्तूर हुआ.दूल्हा या बनडा ४५ के पार था. हालाँकि बताया ३५ का था.मूंछों और बालों में रंग लगाकर जवान बनाने की पूरी कोशिश की गई थी.फिर भी पकी उम्र छुप नहीं पा रही थी.कहते है कि जब वह विदेश में थे तब एक अंग्रेज से शादी कर ली थी.बाद में वह शादी टूट गई थी.अब खानदानी लड़की ढूंढी गई थी।

बीच सिंहासन नुमा कुर्सी पर उसको बिठाया गया.दोनों पक्षों के लोग दोनों और कतार में बैठे थे.पंडित जी मंत्रोच्चार कर रहे थे.दादा और बापू टीका दस्तूर करते हुए चेन,ब्रेसलेट और सिरपेच पहना रहे थे.दो लाख रुपया नगद थाल में रखकर उसको भें किया गया।
फोटोग्राफर धडाधड फोटो खींच रहे थे।

दुल्हे के फोटो मुझे दिखाए जा रहे थे।

औरतो कि छींटा कशी में भी सुन रही थी।

तेरह साल कि बच्ची को जैसा महसूस होना चाहिए था वैसा ही मुझे महसूस हो रहा था। मुझे वो सपनो के राजकुमार लगे...! (समाप्त)











3 टिप्‍पणियां:

समयचक्र - महेन्द्र मिश्र ने कहा…

उम्दा पोस्ट धन्यवाद.

sanjay vyas ने कहा…

बहुत प्रभावी कहानी. कथित उच्च कुल से सम्बन्ध जोड़ने की अमिट लालसा कितनी चीज़ों की बलि ले लेती है,ज़ोरदार तरीके से बयान करती है ये रचना.भाषा का प्रवाह सहज है शैली रोचक है अंत तक बांधे रखती है.एक फोटो की कमी रह गयी.

बेनामी ने कहा…

bahut bhavpoorn kahani hai.poore samay baandhe rakhti hai.lakhan ka yah star prashansniya hai...badhaai!