शनिवार, 25 अप्रैल 2009

एक पहलवान का पहला प्यार

अखाडे में सुबह की कसरत करके हमने अपने गुरु उदैसिंघ जो पहलवानी और जिंदगानी के हमारे इकलौते गुरु थे को प्रणाम किया और घर की ओर चल दिए.गुरूजी वैसे तो कॉलेज में हिंदी पढाते थे पर वंहा भी उनकी शैली अखाडे के मुगदर घुमाने से मिलती जुलती थी.


अखाडे से निकलते ही हमारा सामना विशुद्ध हिंदी के ज्ञाता उपलक्ष्येंद्र प्रसाद 'चराचर' से हुआ जिनसे हम कॉलेज के समय से खुन्नस खाते थे.उनको देख कर हमारी और हमें देख कर उनकी त्योरियां चढ़ गई.फिर यह सोच कर दोनों सहज हुए कि कॉलेज को छोडे चार बरस हो चुके है.


हमने उन्हें चाय का निमंत्रण दिया तो उन्होंने उसे स्वीकार करते हुए आग्रह किया कि उनका घर पास में है पहले उनके यहाँ चाय पी जाए.सो हम उनके साथ हो लिए.



घर पहुँचते ही श्रीमती वीणा प्रसाद के दर्शन हुए.हम झटके से सुनहरे अतीत में जा पहुंचे.वीणा ही वह शमा थी जिसके हम परवाने बन उनमे जलना चाहते थे पर किस्मत ने हमें लुहार कि भट्टी में फुंका डाला, वह बरसात कि बूँद थी जिसका पपीहा बन कर इन्तजार किया था पर खुदा ने हमरे अरमानो को शहर के नालो में फ्लश कर diya, उस चांदनी को हमने चाँद बनकर जीवन में फैलाना चाहा पर हमारे जीवन का रायता ही फ़ैल गया.हमने पहली नजर में अपना दिल वीणा को दे डाला हलाँकि यह हमारा पहला प्रयास नहीं था.पहली नजर के प्यार को पाने के लिए हमने कोई चांस नहीं लिया और जिससे भी नजर पहली बार मिली उसको दिल दे डाला,पर वीणा कि बात कुछ और थी.उसके हम दीवाने हो गए.


हमारे पास हमारे प्रेम के लिए न तो शब्द थे और न साहस.इसलिए हम चाहते थे कि वह हमारे मौन इकतरफा प्रेम को पहचान ले.पर दुनिया बड़ी जालिम है,हमारे कॉलेज के कुछ लड़के उस पर डोरे डालने लगे.हमें अपने प्यार पर संकट नजर आया.हम भागे भागे गुरु उदैसिंघ जी के पास गए.

उदैसिंघ जी सुबह सुबह अखाडे में मुगदर घुमा कर कसरत कर रहे थे.हमने उन्हें अपनी पीडा कातर स्वरों में बयां की.उनके पास हर समस्या का एक ही समाधान था-ताकत.हम गुरूजी की युक्तियों के आगे नत मस्तक हो उठे. उसको प्रपोज करने से पहले हम यह सुनिश्चित करना चाहते थे कि उसके द्वारा मना करने की कोई संभावना न रहे.प्यार तो अहसास है इसे रूह से महसूस करना था इसको प्रर्दशित करना सिद्धांतों के खिलाफ था.सो हमने उनको अपना प्रेम जताने के बजे उनके चारों और सुरक्षा घेरा बनाना ठीक समझा.


उस दिन के बाद जो भी लड़का वीणा के निकट होने का प्रयास करता,शाम को हम हमारे साथियो के साथ पहलवानी मुकाबले के लिए पहुँच जाते और उसको ललकारते हुए उस पर पिल पड़ते.अंत में उसे दुबारा ऐसी नीच हरकत न करने के बदले में उसकी हड्डियाँ सलामत रखने के समझौते पर मुहर लगती थी.हम ठहरे उदैसिंघ जी के शागिर्द जिन्होंने हिंदी कम और पहलवानी ज्यादा सिखाई थी.न तो गुरु उदैसिंघ जी की शादी हुई थी और न उनका कोई शिष्य उनके इस रिकार्ड को तोड़ पाया था.


हमने अंत तक की योजना सोचली थी.चूँकि वीणा का हाथ मांगने का साहस नहीं किया जा सकता था.अतः अन्य विकल्पों पर ध्यान दिया गया.जब हम शतरंज खेलते थे तो शह दे कर मात देने के बजाय राजा के सारे प्यादों और मोहरों को मार कर अंत में अकेले राजा को अमरीका की भाँती सुरक्षित हमला कर मारते थे.


हमने यह तय कर दिया था कि किसी को भी उसके निकट नहीं जाने देंगे,हमने सोच लिया कि उसके पास हमारा कोई विकल्प न रहे.और निर्विकल्प समाधि में आत्मा का परमात्मा का मिलन हो जायेगा.एक एक करके हमने इश्क में आने वाली सारी बाधाओं को रास्ते से हटा दिया.उसके सारे संभावित आशिकों ने हड्डियां सलामती के करार पर दस्तखत कर दिए.

हमारा इश्क इकतरफा परवान चढ़ते हुए अंतिम चरण में पहुँच गया था.हमने ज्योतिषी से राय ली कि किस दिन उसको अपने प्यार का इजहार किया जाये.उन्होंने बताया कि चार माह तक शुक्र अस्त है अतः शुक्रोदय के पश्चात अमुक तिथि को इजहार करना श्रेष्ठ रहेगा.


हम रात दिन वीणा के सपने देखते.गहरी साँसे लेते अमुक तिथि का इन्तजार करते थे.हमारे में इश्क के सारे सिम्टम्स आ गए थे.

पर अचानक दाल भात में मूसलचंद और कबाब में हड्डी कि तरह श्री उपलक्ष्येंद्र प्रसाद 'चराचर' आगये.उन्होंने अपने यू पी का होने और शुद्ध हिंदी ज्ञान का फायदा उठाते हुए पहली मुलाक़ात में वीणा को अपने प्यार का इजहार कर दिया.हमने उन्हें करार के अधीन लाने का प्रयास किया तो उनके पिताजी के पुलिस में होने का उन्होंने नाजायज फायदा उठाते हुए हमारा पिछवाडा क्षतिग्रस्त कर दिया.

हमारी पहलवानी उतर चुकी थी पर हमारा शिष्यत्व प्रखर हो चूका था.हम अविवाहित रहने कि गुरु परम्परा को निभाने वाले शिष्य थे.


हमारी दुनिया उजाड़ चुकी थी।वीणा जो अब श्रीमती वीणा प्रसाद 'चराचर' बन चुकी थी।जो अब भाई साहब कहकर चाय का प्याला हमारी तरफ कर रही थी.हमने पूरे सम्मान से उनके और उनके पति की और देखा.

हमने चाय पीकर इजाजत ली.और घर जाकर गुरूजी और उनके अखाडे की उपलब्धियों को एल्बम में देखने लगा.

8 टिप्‍पणियां:

बेनामी ने कहा…

pahlvaan ji ke saath poori sahnubhooti hai,bechaare dand pelne aur pyar karne me koi fark nahi kar paaye....

अनिल कान्त : ने कहा…

ha ha ha ha ...ye bahut khoob rahi
maza aa gaya

मेरी कलम - मेरी अभिव्यक्ति

श्यामल सुमन ने कहा…

विकट प्यार की आपने चर्चा की श्रीमान।
पहलवान और प्रेम का अच्छा किया मिलान।।

सादर
श्यामल सुमन
09955373288
मुश्किलों से भागने की अपनी फितरत है नहीं।
कोशिशें गर दिल से हो तो जल उठेगी खुद शमां।।
www.manoramsuman.blogspot.com
shyamalsuman@gmail.com

अभिषेक ओझा ने कहा…

हा हा ! मजेदार. आपके पास तो फिर भी उपलब्धियों का अल्बम है... बाकियों के पास तो वो भी नहीं :-)

Kishore choudhary ने कहा…

प्यार और पहलवानी का विकट सम्बन्ध आज ही जाना है अब तक तो सिर्फ चमेली की शादी को बार बार देख कर उसी निर्णय पर अटके थे काश उदेसिघ जी ने भी हमारी पसंद की फिल्म देखी होती तो आपका एल्बम हम देख रहे होते, पर आश्चर्य की बात है पहलवान जी की भाषा सधी हुई कसी हुई और उल्लास से परिपूर्ण है.

बेनामी ने कहा…

हा, हा, पहलवान जी, तुस्सी ग्रेट ....सारे काम लठ बजा कर करना चाहते हो...अच्छी पोस्ट, ....बधाई...!

Anil ने कहा…

पंडितों के चक्कर में न पड़े होते, तो पहलवानजी ने वीणा तकरीबन बजवा ही दी थी ...!!

sanjay vyas ने कहा…

एक पहलवान के विफल प्रेम को इस सम्पूर्ण चराचर जगत में मार्मिक पुकार के साथ दिलों में गुदगुदाते हुए उतार दिया आपने.वीणा के तारों को इतना भी ढीला न छोडों कि कोई स्वर ही न निकले, तो पहलवान प्रभु ने कुछ ज्यादा ही ढील छोड़ दी.
अब ज़रा उन्हें बोलिए कि उस जोशीजी महाराज के पेशी तंतुओं को तबीयत से कस दे:)