मंगलवार, 19 मई 2009

क्षत्रिय उग्ररूप का शिलालेख

सार्थवाह धनगुप्त ने अपने कारवाँ पर नजर डाली.टीले की ऊंचाई से वह अपनी बैलगाडियों की पंक्ति का अंतिम छोर अच्छी तरह से देख पा रहा था.वह वर्षों से अपने कारवाँ के साथ व्यापार करता आ रहा था.पर इस मार्ग से कई बरसों बाद गुजर रहा था.आज का मार्ग कुछ अधिक ही दुर्गम जान पड़ रहा था.


"रक्षक सावधान है!"काफिले के आगे चलते घुड़सवारों की रक्षापंक्ति में मुख्य रक्षक अतिरथ ने जम्हाई लेते हुए अस्पष्ट से स्वरमे कहा.

"रक्षक सावधान है!"थोडी दूर पीछे चलते रक्षकों ने यंत्रवत दोहराया.


"रक्षक सावधान है!"का स्वर घोष हर पीछे वाला रक्षक दोहरा रहा था और इस तरह से यह अंतिम छोर तक पहुँच रहा था.

"कारवाँ सुरक्षित है!" अंतिम रक्षक ने कहा और अब यह नया घोष मंथर गति से पीछे से आगे बढ़ने लगा.


पिछले पंद्रह दिनों से यह कारवाँ कुछ इसी तरह से आगे बढ़ रहा था.सिंध से भृगु कच्छ का ढाई महीनों का सफ़र सबसे कठिन यात्राओं में गिना जाता था.सिंध कि सौदे बाजी में मशहूर चीन का रेशम मिश्र के हाथी दांत विदेशी शराब,आबनूस औए सोना चांदी सब के सब बेश कीमती सामान काफी अच्छे सौदे से हासिल किये थे.वर्षा ऋतू आरम्भ होने से पहले भृगु कच्छ पहुँचने पर इनके अच्छे सौदे होने कि सम्भावना थी.वहां मानसून से पहले समुद्री मार्ग से कोई यात्रा संभव नहीं थी.और इस रास्ते व्यापरी कम जाना पसंद करते थे.धनगुप्त कि गिनती साहसी सार्थवाहों में होतीं थीं और वह इस अवसर को हाथ से नहीं जाने देना चाहता था. किरात कूप नगर अब व्यापारियों और ब्राह्मणों का नगर था.यहाँ पर भी देसी गुग्गुल पन्ना और ताँबा स्थानीय व्यापारियों द्वारा काफी सस्ते दामों में बेचा जाता था.तो वह भी खरीद कर आगे ले जाया जा सकता था.

मरू प्रदेश का यह क्षेत्र अठारह कोस में फैला हुआ था.कारवाँ के अनुभवी लोग इसको एक दिन में पार करना ही सुरक्षित समझते थे.एक तो इस क्षेत्र में पानी नहीं था,दूसरा यहाँ किरात बसते थे जिनके बारें में बड़ी भयानक बातें सुनी गईं थीं.
वे अपने आप को किसी भी जानवर के रूप में बदल सकते थे.
वे जादू टोना जानते थे और धनुर्विद्या और प्रस्तर प्रक्षेपण में अत्यंत दक्ष होते थे.और भी जाने कितनीं बातें...कितनी सही कितनी गलत कुछ पता नहीं.
धनगुप्त उनसे सामना न होने की प्रार्थना ही कर सकता था.
फिर दक्षिण पश्चिम दिशा से रेत का बवंडर उठते दिखाई दिया.जो भयानक तरीके से उनकी और आता दिखाई पड़ रहा था.

"श्रीदास,रेत का तूफ़ान आ रहा है.हमें कारवाँ रोक देना चाहिए."धनगुप्त ने साथी वणिक को कहा.

टीले से नीचे उतरने के बाद काफी बड़ा मैदान रुकने के लिए उपयुक्त स्थान था.वहां पर गोल घेरे में बैलगाडियां और ऊँट गाडियाँ खड़ी कर दी गईं.रक्षकों ने भी अपने आप को फैला लिया.
थोडी देर बाद ऐसा तूफ़ान शुरू हुआ जिसमे अपना हाथ भी सुझाई न दे.और उसने रुकने का नाम न लिया.
कुछ गाड़ियों पर रहने के तम्बू लगे थे,कुछ में पशुओं के चारा और बाकी गाड़ियों पर सामान के गट्ठर थे जो चमडे के पालों से ढंके थे.


धनगुप्त और श्रीदास ने ऊँट गाडी के ऊपर बनाए बड़े से तम्बू में शरण ले रखी थी. आपस में बात करते करते धनगुप्त थोडी थोडी देर में तम्बू से बाहर झाँक कर अंधड़ का जायजा ले रहा था.जैसे जैसे समय बीतता जा रहा था उसकी व्यग्रता और चिंता बढती जा रही थी.वह उठकर तम्बू से बाहर आगया शायद यह सोच कर कि कदाचित ऐसा करने से तूफ़ान रुक जाए पर एक तेज झपेटे ने उसकी आँखों में काफी रेत भर दी.वह फिर तम्बू के भीतर आगया.

"श्रीदास, लगता है आज प्रकृति हमारे विपरीत संचालित हो रही है.हमें यह क्षेत्र रात में पार करना पड़ सकता है,जो सुरक्षित तो नहीं है पर इसके सिवाय को चारा नहीं है."धनगुप्त ने कहा.


"पर अभी तो तूफ़ान ऐसा चल रहा है कि दिन में भी नहीं बढ़ पा रहे है."


"मौसम ठंडा होते तूफ़ान धीमा पड़ जाएगा."


"और हम रात में यहां रुक जाएँ तो?"श्रीदास की अनुभव हीनता उसकी बातों में दिखाई पड़ रही थी.


"नहीं,ऐसा नहीं कर सकते कल के दिन के लिए हमारे पास पानी नहीं बचेगा."धनगुप्त ने सांस छोड़ते हुए कहा.

ढेर सारी चिंताओं के बीच में अंधड़ की गति कुछ कम हुई.रात्री के प्रथम प्रहर बीतते अंधड़ रुक चुका था.अंधड़ और अँधेरे का परिणाम था कि मार्ग का कोई पता नहीं चल रहा था.आकाश में रेत पसरी होने से तारों से भी दिशा का अनुमान नहीं लगाया जा सकता था.अब सार्थवाह कि विगत स्मृतियों और अनुभव के सहारे ही कारवाँ को आगे बढ़ना था.
मध्य रात्रि तक चलने के पश्चात मार्ग के दायीं और पहाडियों की श्रृंखला दिखाई दी.धनगुप्त ने आँखे फाड़ करके यह सुनिश्चित किया कि जो दिख रहा है वह भ्रम नहीं है.मरू प्रदेश में वे लोग वहां पहुँच गए थे जहां पानी मिल सकता था.
पहाडियों के बीच छोटा सा नगर बसा था.द्वार पर रक्षक पहरा दे रहे थे.

"कौन है?"रक्षक ने कठोर स्वर में पूछा.

"मैं धनगुप्त हूँ,पुरुषपुर की एक वणिज श्रेणी का श्रेष्ठी और सिंध से आए एक कारवाँ का सार्थवाह.अपना कर लो और हमें भीतर आने दो."धनगुप्त ने कहा.

"कारवाँ कितना बड़ा है?"रक्षक ने पूछा.

"एक सौ बीस गाडियां है.डेढ़ सौ रक्षक और दो सौ अन्य व्यापारी और सेवक है."

"दो सौ सिक्के."

धनगुप्त ने कमर में बंधी दो सिक्कों की थैलियाँ निकल कर रक्षक को दे दी.

"यहाँ धर्मशाला होगी?"

"आगे जाकर बाई ओर मंदिर के पास."

थोडी देर में धर्मशाला के पास के मैदान में गाडियाँ पंक्तिबद्ध खड़ी थी.और सभी लोग अपने अनुकूल स्थानों पर निद्रा की गोद में विश्राम कर रहे थे.

अचानक तीव्र कोलाहल सुन कर धनगुप्त की आँख खुल गई.पहाडों से प्रस्तरों और तीरों की बौछार हो रही थी.

"सावधान!किरातों ने आक्रमण कर दिया है..."

धनगुप्त धर्म शाला से बाहर निकला ही था कि एक क्षिप्त प्रस्तर तेज गति से उसके कान के पास से गुजरता हुआ खम्भे से जा टकराया. खम्भे से चिंगारियां निकली.चारों तरफ अफरा तफरी मची हुई थी.नगर निवासियों ने अपने घरों के द्वार बंद कर दिए. शहर के रक्षक किरातों का मुकाबला नहीं कर पा रहे थे.

"अतिरथ,अपने रक्षकों को सावधान कर प्रत्याक्रमण करने को कहो."धनगुप्त ने मुख्य रक्षक को चिल्लाते हुए कहा.

थोडी देर में कारवाँ कि रक्षक सेना नगर रक्षकों के साथ मिल कर लड़ने लगी.धनगुप्त ने श्रेणी के व्यापारियों को भी शस्त्र सँभालने को कहा.नगर कि सेना इस हमले के लिए तैयार नहीं थी.और किरातों के ऐसे सुनियोजित हमले कि उम्मीद किसी ने नहीं की थी.मुख्य रक्षक सतर्क निगाहों से हमले की दिशा भांपने का प्रयास कर रहा था.तीर और पत्थर सभी दिशाओं से आरहे थे.उत्तरी पहाडी से बार बार ऊंची आवाजे आरही थी.उसको अनुमान लगाने में देर नहीं लगी की किरातों का आक्रमण वहीँ से ही नियंत्रित किया जा रहा है.कारवाँ की सुरक्षा करते ऐसे कई अचानक हमले झेलने का अनुभव उसके काम आ रहा था.उसने अपने दक्ष रक्षकों की एक टुकडी को शीघ्रता से निर्देश दिए.थोडी देर में पन्द्रह रक्षकों की टुकडी दीवारों और पत्थरों की ओट में उत्तरी पहाडी की ओर बढ़ गई.उन लोगों ने पहाडी पर चार किरात युवकों को घेर लिया और बंदी बनाते हुए हमला रोकने को कहा.हमला रुक गया और इधर भोर का उजाला फैलने लगा.
चारों युवकों को नगराध्यक्ष के समक्ष प्रस्तुत किया गया.चार पांच सौ किरात अभी भी नगर पर घेरा डाले पहाडियों पर स्थित थे.उनका नेता उग्ररूप बंदी बनाया जा चुका था इसलिए हमला रोक दिया गया था.पर अगर बंदियों को नुक्सान पहुँचाया जाता तो हमला फिर किया जाना अवश्यंभावी था.


"किरात युवक, यह अनावश्यक आक्रमण क्यों की गया?"नगराध्यक्ष ने पूछा.


"आपने हमारे जलस्रोत पर अनुचित अधिकार कर रखा है."उग्ररूप ने कहा.


"यह सही नहीं है.यह हमारा नगर है.और जलस्रोत भी हमारा है.इस पर तुम कैसे अधिकार जता सकते हो ?"नगराध्यक्ष ने कहा.

"चालीस बर्ष पहले आपके कारवाँ यहाँ से गुजरते थे और हमारे कूप से पानी ले जाने की प्रार्थना करते थे.और फिर आपने अपने मंदिरों में पूजा के लिए यहाँ से पानी लेना आरम्भ किया.और अब आपने हमारे जलकूप के चारों और भी दीवार बनादी.अब हम अपने जलकूप के उपयोग से वंचित का दिए गए है."उसने उत्तर दिया.

"तुम कदाचित सही नहीं हो युवक.यह नगर परमार शासकों की सुरक्षा में बरसों से है.इस कूप पर किरात लोगों के अधिकार में होने अथवा बसने का कोई प्रमाण नहीं है."नगराध्यक्ष ने शांत स्वर में कहा.

"इसका प्रमाण है इसका नाम ...किरात कूप !जो अब आपके नगर का भी नाम है.रही हमारे बसने की बात तो हम प्रकृति पुत्र है.हम सारी प्रकृति में बसते है.और हम आवश्यकतानुसार ही यहाँ आते है."उग्ररूप ने दृढ़ता से कहा.

"ठीक है युवक हम तुम लोगों को पश्चिमी द्वार से पानी के लिए आने की अनुमति दे सकते है."

"नहीं, यह नहीं हो सकता है !हम मंदिर में वह जल नहीं चढा सकते जहाँ से अस्पृश्य किरात पानी भरें.हमने सिन्धुराज से मंदिरों की पवित्रता बनाए रखने की विनती की थी तभी यह दीवार बनाई गई है."मंदिरों के धर्माधिकारी ने रोष भरे स्वर में आपत्ति प्रकट की.

"नगराध्यक्ष अनुमति दे तो में कुछ कहूं."धनगुप्त जो अब तक चुप था, बोला.

"अवश्य कहो सार्थवाह."

"पानी कभी अपवित्र नहीं हो सकता है ,हमने अपनी दुर्गम यात्राओं से से यही सीखा है.और फिर इस मरू प्रदेश में तो यह अमृत है..और.."


धर्माधिकारी का चेहरा रोष से तमतमा उठा,"जगह जगह की यात्राओं पर जाने वाले वणिक शास्त्रों के अनुसार अपवित्र होते है...देव पूजन कैसे और किस जल से किया जाए यह तुमसे ज्यादा हम जानते है."

"पर शायद आप यह नहीं जानते की अर्ध सहस्र किरात आपके नगर को घेर कर बैठे है."धनगुप्त ने कहा.

"फिर हम मरते दम तक आपसे लडेंगे."उग्ररूप बोला.

नगराध्यक्ष ने रोका.

"आप क्रोध न करें धर्माधिकारी,आप के लिए और समस्त शास्त्र सम्मत कार्यों के लियें हमने यहाँ से कुछ दूरी पर कूप खुदवाने का कार्य काफी पहले से आरम्भ कर दिया था.पर उसमे अभी पानी नहीं निकला है.तब तक वापी का जल पूरी तरह आपके कार्यों के लिए प्रयुक्त होगा.किरात युवक हमारी आप लोगों से कोई शत्रुता नहीं है आप अपने और पशुओं के लिए आपके कूप से पानी ले सकते है."नगराध्यक्ष ने निर्णय दिया.
धर्माधिकारी के चेहरे पर अप्रसन्नता झलक रही थी.सभी युवकों को छोड़ दिया गया .किरातों की घेराबंदी समाप्त होने से सबने राहत महसूस की.धनगुप्त ने कारवाँ को चार दिन विश्राम देने को कहा.तब तक स्थानीय व्यापारियों से कुछ व्यापार किया जाना था.

"नगराध्यक्ष...बधाई..!नए कूप में मीठा जल निकल आया है.भरपूर है."सेवक ने सूचना दी.

धर्माधिकारी के चेहरे पर प्रसन्नता और दंभ उमड़ आया."ईश्वर का चमत्कार देखिये...आपने कूप के जल को अस्पृश्यों को अनुमत किया तो नए कूप में मीठा और अथाह जल निकल आया...नगराध्यक्ष.अब हम किरात कूप का जल कभी प्रयुक्त नहीं करेंगे...और हाँ,आप नवीन कूप की सुरक्षा व्यस्था शीघ्र कर दें..नए कूप का नाम हम भद्र कूप रखते है..और हमारी तरफ से एक शिलालेख महाराज सिन्धुराज परमार की राजाज्ञा में स्थापित किया जाए.आज से धार्मिक कार्यों में केवल भद्र कूप का जल प्रयुक्त किया जाएगा."

उग्ररूप २१ वर्ष का किरात युवक था.उसके पिता सात किरात कबीलों के नेता थे.और पंद्रह वर्ष पहले विशाल तुरुष्क सेना से अपने कबीले के लोगों की रक्षा करते हुए मारे गए थे.इसलिए उग्ररूप का किरातों में बड़ा सम्मान था.वह उड़ती चिडिया पर अचूक निशाना लगा सकता था.आर्यों से कूप को मुक्त कराने के बाद कबीले की कितनी युवतियां उस पर न्योच्छावर होने को तैयार थी.पर वह श्यामला पर मोहित था.किरातों के रिवाज के अनुसार उसे श्यामला के पिता को दस अलग अलग शिकार भेंट करने थे.उसमे से पिछले दो महीनों में नौ शिकार उसके द्वारा भेंट किये जा चुके थे.आज वह नर चिंकारा का शिकार कर अपने होने वाले ससुर को भेंट कर श्यामला का हाथ मांगने वाला था.वह सुबह से अपने साथियों के साथ आखेट पर निकला था.आज का आखेट बहुत अच्छा रहा था.एक मृग तीन खरगोश,और दस तीतर.और अब उसका नर चिंकारा पर निशाना अचूक रहा.थोडी देर में आखेट में मिली सफलता से उत्साहित आठ किरात युवक एक साथ होकर मजरे की ओर चल पड़े.तभी उन्होंने देखा कि दक्षिण कि ओर सिंध से आने वाले मार्ग पर धूल का गुबार उठ रहा था.शायद रेत का तूफ़ान...नहीं..?नगाडों और तुरही कि दूर से आती आवाजों ने उनके दिल में भार सा रख दिया था.क्या कोई आक्रमण ..?उसने जीवन में कभी विशाल सेना का आक्रमण नहीं देखा था.उसके पिता कि यादों ने मन को और भारी कर दिया.पर उसने सुना था कि जिस मार्ग से विशाल सेनाएं गुजरती है तो वे आस पास के गाँवों कि खाद्य सामग्री लूट लेती है.युवक युवतियों को दास बना लेती है...और बड़ों और बच्चों का कत्ल कर देती है.और सेना तो उनके मजरे के रास्ते से आ रहीं थी.वह चिंतित हो उठा और सभी तेज क़दमों से आगे बढ़ने लगे.

उधर तुरुष्क सेना के लगभग पचास अश्वारोही गाँव की ओर बढ़ गए.उन्होंने देखते देखते गाँव में घरों पर जलती मशालें फैंकनी शुरू कर दी.ऐसा इसलिए किया गया की गाँव के लोग घरों में छुप न सकें.सारा गाँव धू धू कर जलने लगा.सब लोग घरों से बाहर आ गए.जो न आ सके वे भीतर ही जल गए.वृद्धों और बच्चों को मौत के घाट उतार दिया गया.जवान औरतों और लड़कियों को हाथ पर नीला कपडा बाँध कर दास बनाया गया.जवान लड़कों को भी गुलाम बना लिया गया.और सब लोग उस दिशा में बढ़ने लगे जिधर से सेना गुजर रही थी.
उग्ररूप और साथियों ने अश्वारोहियों को दूर से लोगों को हांकते हुए आते देखा तो वे वृक्षों की ओट में हो गए.और उसने देखा श्यामला सहित उसके गाँव की युवतियों को भाले की नोक पर बेरहमी से आगे धकेला जा रहा था.उसकी समझ में आ गया की सब कुछ तबाह हो चुका है.अब गाँव में न तो कोई जिन्दा बचा होगा और न कुछ शेष बचा होगा.उसके कई साथी अब तुरुष्कों के गुलाम थे.
"शत्रु से मुकाबला कर मर जाना श्रेष्ठ है,"उसने सोचा.फिर उसके मन में आया यह तो आत्म हत्या होगी.उनका पीछा किया जाये और अवसर मिलने पर अपने साथियों को छुडाया जाए.पर थोडी देर में ये लोग मुख्य सेना से मिल जायेंगे.फिर तो कुछ भी करना असंभव हो जाएगा.इन विचारों से कुछ दूरी बनाते हुए वे भी साथ चलने लगे.


"कई काफिर हमारे गुलाम हो गए है.पर सुलतान कल बुत शिकन की उपाधि लेंगे.कल कई काफिरों का कत्ले आम करने का हुकुम मिला है."अश्वारोहियों में एक ने कहा.


"पर वह शहर तो अभी दूर होगा."दूसरे ने पूछा.

"नहीं ज्यादा दूर नहीं है.पर कल जुम्मे की नमाज के बाद यह नेक काम किया जाएगा.आज रात को ही घेरा डाल देंगे."

"उनको खबर हो गई तो शायद हमें कुछ भी न मिले."

"नहीं, अभी तक एक भी व्यक्ति को जिंदा नहीं छोडा गया है जो किसी को खबर कर सके."

उग्ररूप को अब समझ में आरहा था की उसने जो देखा है वह तो शुरुआत भर है.इस इलाके में अब कुछ भी नहीं बचना है.बच्चों और बूढों के कत्ल.घरों में आग लगा देना.कितने क्रूर हो सकते है ये राक्षस!ये कुछ नहीं देखते की हम किरात है या कोई ओर.बस इन्हें तो केवल बर्बादी करनी आती है.हमारी इनसे कोई दुश्मनी नहीं,फिर भी ये हमें क्यूँ मारते और गुलाम बनाते है.क्या सभ्य लोगों में इतनी भी इंसानियत नहीं है.हम जंगली लोग अकारण एक पशु का वध नहीं करते और ये कत्ले आम को नेक काम कहते हैं.अच्छा है हम जंगली है और हमारा कोई धर्म नहीं है.काश प्रकृति दावानल बन कर इन सबको भस्म कर दे.उसका दिल फटा जा रहा था.अपने आप को इतना कमजोर और असहाय कभी अनुभव नहीं किया था.उसका मन रोने को कर रहा था.वह चलते चलते रुक गया.और झाडी की ओट से श्यामला को जाते हुए देखने लगा जिसकी बांह में नीला कपडा बंधा था.वह आज शाम को उसकी होने वाली थी.पर आज उसके वृद्ध पिता की लाश तबाह हुए गाँव में कहीं पड़ी होगी.
उसकी आँखों में अश्रु धार बह चली.

उसने सब साथियों को कहा-"मित्रों,हम अपना सब कुछ खो बैठे है.पर हमें यह प्रयत्न करना है कि हम किरातों के जितने कबीलों ,गाँवों और लोगों को बचा सकें बचाएं.हम सब अलग अलग कबीलों को आक्रमण की सूचना पहुँचाएँगे. हम जितने तेज पहुँच सके उतना अधिक समय मिलेगा.सब किरातों को उग्ररूप की तरफ से यह सूचना दें कि तुरुष्क आक्रमण से बचने के लिए सभी लोग जितना हो सके दूर वनों में चले जाएं.और अपने खाद्य भंडारों को आग लगा दें ताकि शत्रु इसका उपयोग न कर सकें.वन देवी हम सबकी रक्षा करे."


फिर सब अलग दिशाओं में दौड़ लिए.उग्ररूप किरात कूप नगर की ओर जा रहा था.आज वह इतना तेज दौड़ रहा था जितना मृगया में भी कभी नहीं दौड़ा था.थोडी देर में वह नगराध्यक्ष को को सब बता रहा था.
सभी मंदिरों के गर्भ गृह से मूर्तियाँ धनगुप्त के कारवाँ की गाड़ियों में लादी गई.नगर के लोगों ने जोकुछ साथ ले सकते थे लेकर नगर छोड़ दिया.उग्ररूप को साथ चलने को कहा तो उसने इनकार कर दिया.वह तुरुष्कों का सामना करना चाहता था.

"तुम मूर्ख हो युवक.तुम उनका सामना नहीं कर पाओगे."

"जानता हूँ.पर आस पास जल का एक मात्र स्रोत किरात कूप ही है.शत्रु यहाँ से पानी लिए बिना आगे नहीं बढ़ सकता.मैंने अगर उन्हें सुबह तक रोक लिया तो कई जाने बच सकती है."

"मैं भी इससे सहमत हूँ.सार्थवाह हमारा कर्तव्य आपकी रक्षा करना है और वह हम यहाँ पर शत्रु को रोक कर बेहतर कर सकते है."अतिरथ ने कहा.
नगर सेनापति भी सहमत था.
"पर यह तो जान बूझ कर अपने प्राण देना हुआ."धर्माधिकारी ने कहा.
"अगर हम आपके साथ भागते है,तो यह कायरता होगी."नगर सेनापति ने कहा.
सभी लोगों ने प्रस्थान किया.
उस रात तीन सौ के लगभग सैनिको ने विशाल तुरुष्क सेना को अपने तीरों से रोके रखा.रात भर आक्र्न्ताओं के सैनिक और अश्व पानी के लिए तरसते रहे.सुबह होते होते उग्ररूप अतिरथ और नगर सेनापति सहित सभी रक्षक मारे गए.आक्रमण कारियों को नगर में कत्लेआम के लिये कोई जीवित नहीं मिला तो उन्होंने मंदिर की एक एक मूर्ती को तोड़ दिया.पूरे नगर का ध्वंस कर दिया.

कई वर्षों बाद भद्र कूप के शिलालेख में वर्णित किया गया-किरात कूप नगर की तुरुष्कों से रक्षा करते हुए क्षत्रिय उग्ररूप के नेतृत्व में तीन सौ सैनिक वीरगति को प्राप्त हुए.आज एक चबूतरे के ऊपर जिस पर शिला लेख को मूर्ति के रूप में स्थापित किया गया है की स्थानीय आदिवासी झुजार देवता के रूप में पूजा करते है.

"अब चलना नहीं है क्या?' मेरी धर्मपत्नी ने मुझे जगाया.किराडू मंदिर के ध्व्न्सावशेशों में एक भग्न मंडप के खम्भे से पीठ टिकाये सोचते सोचते मैं जाने कहाँ खो गयाथा.

"लगता है आँख लग गई."मैंने कहा.

"आप भी हद करते है.कितनी अच्छी जगह थी और आप है की यहाँ भी सोते ही रहे."

"कोई बात नहीं,यह जगह मेरे पहले से देखी हुई है.अब चलो."

हम दोनों गाड़ी की और बढ़ गए.बच्चे वहां इन्तजार कर रहे थे.

6 टिप्‍पणियां:

sanjay vyas ने कहा…

जिस पश्च-दीप्ति में इतिहास के विस्मृत पन्नों से लेखक कथा सृजन कर रहा था उसी समय मैं भी सब कुछ होते देखने का प्रभाव भीतर महसूस कर रहा था.कथा बेहद बाँधने वाली है और वृन्दावन वर्मा और के.एम्.मुंशी के लेखन की याद दिलाती है.
किराडू के जिन खंडहरों को देख आपके लेखक ने सृजनात्मक वैभव की सर्जना की है उसी स्थान को मैंने भी देखा है और आश्चर्य होता है कि मंदिर जिस शास्त्रीय संस्कृति की ओर इंगित करते है वहीं उनमे ऊँट का अंकन स्थानीय परिवेश का प्रभाव भी झलकाता है.
बधाई और ऐसे ही अन्य की अपेक्षा में.

Kishore choudhary ने कहा…

देश के सांस्कृतिक और ऐतिहासिक स्थलों के संरक्षण के लिए पिछले साठ सालों में सरकारी योजनाओं में व्यय किये गए धन और श्रम के जाया होने के कई उदहारण आपको इस समृद्ध देश में मिल जायेंगे. किरात कूप के एक काल खंड को आपने अपने साहित्यिक कौशल से प्राणों से भर दिया है. इस पोस्ट को पढ़ते समय आपकी लेखन कला के बारे में सोचता रहा. आप कई बार मुझे अद्वितीय लगते हैं.

टिपण्णी भेजने का लिंक सफ़ेद रंग में हो गया है खोजने में परेशानी हो रही है इस पर ध्यान दें.

Babli ने कहा…

आपकी सुंदर टिपण्णी के लिए बहुत बहुत धन्यवाद!
मुझे आपका ये ब्लॉग बेहद पसंद आया! इतना ख़ूबसूरत लिखा है आपने कि मैं शब्दों में बयान नहीं कर सकती! आपकी लेखनी का जवाब नहीं और खास बात ये है कि आपका ब्लॉग सबसे जुदा है! लिखते रहिये और हम पड़ने का लुत्फ़ उठाएंगे!

abhivyakti ने कहा…

संजय भाई, किशोर भाई...
ये आपका दिया हौसला है कि मैं कुछ लिख पा रहा हूँ.वर्ना जिस माहौल में हम रहते हैं वहां कुछ पढने तक की सोच नहीं सकते...
जानता हूँ बहुत कुछ कमियाँ लिखने में रह जाती है ..पर आप उन्हें इसलिए गौर नहीं करते कि कहीं मेरा हौसला न टूट जाए...आपके और किशोर भाई के लेख तो बहुत पहले से प्रकाशित होते आये हैं.पर मुझे तो व्याकरण भी ढंग से नहीं आती.
बस ये दिल का जोर है कि लिख देता हूँ.....कभी ब्लॉग में आती समस्याओं से परेशान हो जाता हूँ..तो कभी कम टाइप करे की आदत से ...आप और किशोर भाई जो पग पग पे साथ रहते हैं तो फिर चल पड़ता हूँ...आपका शुक्रिया कहने के लिए शब्द कम पड़ेंगे..
ऊर्मि जी ये पंक्ति
शिकवा और शुक्रिया क्या कहें आपसे
लफ्जों का तकल्लुफ जमाने के लिए छोडा....


आपका

पाखी

sonia shah ने कहा…

आप बहुत अच्छा लिखते है,ख़ास तो विविधता और रोचकता दोनों आपके लेखन में दिखाई पड़ते यह अनुमान लगाना कठिन है की आप की अगली पोस्ट किस विषय पर होगी...बधाई..!

आगे भी इस तरह का रचनाकर्म जारी रखें.

सोनिया शाह.

बेनामी ने कहा…

adbhut,advitiya aur avismraniya