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रविवार, 30 अगस्त 2009

सच सच कहना आज कहाँ है... !


जिन गलियों में तुम और मैं कदम कदम पर साथ चले थे

उन गलियो की उड़ती धूल मन में मीलो महक रही है


चौराहों पर घंटो घंटे बातों बातों बिता दिए थे

मूंग फलियो के उन छिलकों में कुछ कुछ दाने मेरे भी थे


मूवी में वो मीठी सीटी बजा बजा के मजे लिए थे

आगे बैठी सुन्दर लड़की अन्दर अन्दर बसी हुई है


बारातों में घोडी आगे नच नच भंगडे जो किये थे

वो लड़की अब ताने कसती खिल खिल हंसती यादों में है


परीक्षा की वो तैयारी जब रातों रातों साथ जगे थे

चाय बनाना किसकी बारी चुस्की चुस्की याद मुझे है


होटल की वो आधी चाय पूरा पूरा दिन ले लेती

ऊँचे सुर के हंसी ठहाके और खुश खुश चेहरे आज कहाँ है


मंदिर चढ़ कर चढ़े चढावे कर बटवारा बांटे थे

उनको खाते देखे सपने सच सच कहना आज कहाँ है... !

व्यस्तता की वजह से कुछ दिन नेट से दूर हूँ...सभी साथियों से कुछ और दिन की इजाजत चाहता हूँ..तबतक एक पुरानी सी कविता दुबारा आपको प्रस्तुत कर रहा हूँ ..सुझाव संजय जी का था जब ब्लॉग शुरू ही किया था और कम लोग ही उसे पढ़ पाए थे....संजय जी ने कहा था इसे कुछ समय बाद वापस ब्लॉग पर डाल देना...तो अब इन दिनों व्यस्तता के चलते ब्लॉग पर कुछ नहीं लिख पा रहा हूँ तो यह कविता आपके लिए...
पाखी