किनारे को गर किनारा चाहिए,
नहीं अब दरिया दुबारा चाहिए ,
ओ मेरी दामन की लहरों ,
किसे अब यहाँ ठिकाना चाहिए ,
दरिया और लहरें निकल जायेंगे ,
दोनों किनारे भी मिल जायेंगे ,
बचेगी फकत माटी इस राह पे ,
कहाँ अब किनारे भी बच पायेगे
(२)
दर्द दिल के करीब हो तो लफ्जों में सांस होती है,
ग़मों को जिन्दगी बना कर लिखी हर नज्म ख़ास होती है
सजदा कर जब रूह में उतर जाए गम-ऐ-जिन्दगी,
तब , तेरी दुआ औ इबादत खुदा के कुछ पास होती है
(3)
आहत मन जब बंट बंट जाता,
कोई हताशा कोई निराशा,जब चुभती थी गहरी गहरी,
ज्यूँ आसमान पे काली बदरी,।देखी मैंने चमक सुनहरी, तो मुस्कानों से बात बनी थी ...