सर्वाधिकार सुरक्षित-लेखक लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
सर्वाधिकार सुरक्षित-लेखक लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

रविवार, 29 मार्च 2009

वो अश्क किसके थे जिनमे भीगी थी जिन्दगी सारी

अबसार भीगे थे,जुबाँ खामोश, थी मन में बेकरारी

किस इजबार से मुस्करा रहे थे किसी ने क्या ईशारा कर लिया

छोड़ के आये जात मजहब अजलाल औ दुनियादारी

तब डर न था बैठ बारूद पे हमने शरारा कर लिया

शानो पे सर रख ग़म और इब्तिदा सुनाते थे रात सारी

जब छोड़ गए, अब्तर-आशियाँ और क्या हाल हमने हमारा कर लिया

वो अश्क किसके थे जिनमें भीगी थी जिन्दगी सारी


उनकी नजरो ने 'पाखी', क्यूँकर किनारा कर लिया

शब्दार्थ-अबसार-आँखे,इजबार-विवशता,अजलाल-वैभव,शरारा-चिंगारी,अजबाले ग़म-दुखो का पहाड़,इब्तिदा-परेशानी,अब्तर-आशियाँ-अस्तव्यस्त घर,