अबसार भीगे थे,जुबाँ खामोश, थी मन में बेकरारी
किस इजबार से मुस्करा रहे थे किसी ने क्या ईशारा कर लिया
छोड़ के आये जात मजहब अजलाल औ दुनियादारी
तब डर न था बैठ बारूद पे हमने शरारा कर लिया
शानो पे सर रख ग़म और इब्तिदा सुनाते थे रात सारी
जब छोड़ गए, अब्तर-आशियाँ और क्या हाल हमने हमारा कर लिया
वो अश्क किसके थे जिनमें भीगी थी जिन्दगी सारी
उनकी नजरो ने 'पाखी', क्यूँकर किनारा कर लिया
शब्दार्थ-अबसार-आँखे,इजबार-विवशता,अजलाल-वैभव,शरारा-चिंगारी,अजबाले ग़म-दुखो का पहाड़,इब्तिदा-परेशानी,अब्तर-आशियाँ-अस्तव्यस्त घर,